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'नारी द्वेषी समाज' by Sudha Dixit

मानव समाज ने चाहें जितनी भी उन्नति कर ली हो; उसका पुरातन अतीत अभी भी परछाईं की तरह उसके साथ चिपका हुआ है। आदिम काल में मनुष्य शिकार करके गुज़र बसर करता था। वह जंगली था। एक ओर जंगली जानवरों का शिकार किया करता था पेट की भूख बुझाने के लिये। दूसरी ओर स्त्री के बाल पकड़ कर गुफ़ा में ले जाता था शरीर की भूख़ मिटने के लिये। आज भी जंगली है। जानवरों का शिकार करता भी है तो मनोरंजन के लिये और स्त्री को बिना बाल पकड़े ही इस्तेमाल करता है बदन की भूख़ मिटाने के लिये। स्त्रियां वह सब बर्दाश्त कर लेती थीं क्योकि पुरुष वाक़ई जंगली थे। ये और बात है कि पुरुष आज भी जंगली ही हैं। बावजूद सभ्यता के विकास के आदमी पूर्णतया सभ्य नहीं हो पाया। पढ़ लिख ज़रूर गया। ढंग के कपड़े भी पहनने लगा - पहले की तरह नंगा नहीं घूमता। घर बना कर भी रहना सीख गया। बहुत कुछ सीख गया लेकिन औरतों के मामले में अब भी वहीँ का वहीँ है यानि - जंगल में। अफ़सोस तो इस बात का है कि औरतें आज भी उसके जंगलीपन और पशुवत व्यव्हार को बर्दाश्त करती हैं। वे बर्दाश्त करती हैं क्योंकि सभी स्त्रियाँ परिस्थिति का सामना नहीं कर पातीं। कारण अनेक हैं मसलन - आर्थिक, सामाजिक अथवा भावनात्मक। आर्थिक कारण समझ में आता है। पुरुष भी पैसे के लिये समझौते करते हैं। कुछ हद तक भावनात्मक भी तर्कयुक्त लगता है क्योकि नारी पैदाइशी जज़्बाती होती है। सामाजिक कारण पर मुझे आपत्ति है। माँ बाप के घर में भी अमूमन बेटे को दूध तथा बेटी को चाय पिलाते हैं। ससुराल की बात तो करनी ही बेकार है। बहु का कर्तव्य होता है सारे घर को खुश रखना जबकि सारा घर मिल कर एक इकलौती बहु को खुश नहीं रख पाता।


मनु महाराज ने "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" कह कर अपनी कूटनीति का परिचय दिया है। उनकी 'मनुस्मृति' में ही औरतों को कितना सम्मानित किया गया है यह तथ्य पढ़ो तो जानो। पुरुषों की ज़रूरत और मनोरंजन के लिये वैश्यालय हैं। महिलाओं के लिये तो इस क़िस्म की कोई चीज़ नहीं है। क्यों ? क्योकि वे पूजा की चीज़ हैं। "चीज़" हैं - "वस्तु " हैं, "इंसान " नहीं। पुरुष पूजा की ' चीज़' नहीं हैं लेकिन 'पति परमेशवर' कहलाते हैं। केवल पति बन कर ही नहीं, दूसरे रिश्तों में भी वो किसी देवता से कम नहीं होते।

तमाम पाबंदियाँ, नेतिकताएँ लक्ष्मण रेखा के नाम पर औरतों के लिये हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि "लड़के आख़िर लड़के होते हैं" कहने वाले यह नहीं समझ पाते कि ऐसा कह कर वे लड़कों - आदमियों पर लांछन लगा रहे हैं। मतलब "लड़के तो होते ही हैं बरिबंड या चरित्रहीन। वे औरतों की इज़्ज़त नहीं कर सकते।“ वे बलात्कार करना भी अपने पुरुषत्व की मजबूरी मानते हैं। कमाल है साहब ! इक्कीसवीं सदी में भी कोई महिला यदि पब यानि शराबघर में पहुँच जाये तो नशे में चूर पुरुष उसे हिक़ारत की नज़र से देखते हैं ,यानि "देखो ये औरत कितनी गिरी हुई है जो शराब पीने आयी है।

भैय्ये -- हमारे चेहरे के दाग़ों पे तंज़ करते हो हमारे पास भी है आइना, दिखाएँ क्या


घर के बाहर एक महिला पर क्या बीतती है वह तो जग ज़ाहिर है मगर स्वयं अपने घर में भी स्त्री पर क्या गुज़रती है वह कुछ कम कष्टदायक नहीं है। घर को सजा सवाँर के रखे तो ये उसका काम है और अगर न रखे तो फूहड़। मतलब कोई और यह निर्णय लेगा कि घर को कैसे रखना चाहिये। तो फिर घर किसका है। जिस घर पे उसके नाम की पट्टी (नेम प्लेट) तक नहीं वो उसका घर कैसे हो गया ? औरत अगर घर में रह कर दिन रात भी काम करे तब भी पति कमाऊ होने का रौब जमाता है। बाहर जाकर काम करे तो घर और बच्चों को नज़र अंदाज़ करने का इलज़ाम। घर के बाहर लोगों के कटाक्ष - "भई मॉडर्न हैं ". दफ़्तर में पुरुष वर्ग महिला सहकर्मियों को 'उप्लब्द्ध' अर्थात available समझता है। सहकर्मी उनके साथ रोमांस करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। वही सहकर्मी जो शायद अपनी बहन को उसके सहपाठी के साथ बात तक न करने दें।

यही दोहरा मापदंड हमारे समाज का अभिशाप है।


एक ज़माने में लोग अपने घर की लड़कियों को फिल्म लाइन में नहीं भेजते थे। अब किसी को कोई आपत्ति नहीं होती क्योंकि फिल्म ही क्यों हर जगह वही हाल है। यहां तक की तकनीकी क्षेत्र में भी प्रायः बॉस अपनी मातहत महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करने से बाज़ नहीं आते। "मैं भी " यानि "me too " शीर्षक का जो आंदोलन शुरू हुआ था ,वह अनेक लोगों को बड़ा नागावार गुज़रा था। नागावार इसलिये कि उसके कारण कई जाने माने लोगों का पर्दाफ़ाश हुआ था। अच्छी बात ये हुई कि इस आंदोलन को सबसे ज़्यादा समर्थन महिलाओं की ओर से मिला। एक ज़माने में औरत ही औरत की दुश्मन हुआ करती थी, मगर अब नहीं। तब औरत कमज़ोर थी और कमज़ोर ही ग़द्दारी करता है। आज की औरत काफ़ी हद तक समर्थ है। आज औरत औरत होने के दर्द को समझती है और उसकी सहायता करने को तत्पर रहती है। माना कि मंज़िल अभी दूर है किन्तु उम्मीद दूर नहीं है। अँधेरी गुफ़ा के अंत में रौशनी की किरणों का आभास झलकता है। हमारा समाज अभी भी पुरुष प्रधान है, परन्तु विकास के मामले में स्त्रियों की रफ़्तार पुरुषों से ज़रा तेज़ है, बस थोड़े से सु अवसर की आवश्यकता होती है। पुरुष वर्ग अब सिर्फ इतना समझ ले -

हमीं हैं सोज़, हमीं साज़ और हमीं नग़मा


ज़रा सम्भल के सरे बज़्म छेड़ना हमको

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